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Friday, 22 April 2016

आईना

ज उसने आईना गौर से देखा, बड़ा धुंधला सा नज़र आ रहा था। कुछ समझ नहीं पा रही थी, आईना धुंधला पड़ गया है या फिर उसकी आँखें ऐसे देखने लगी हैं! इस बात को नजरअदांज कर दें तो बालों में सफेदी अधिक झांकने लगी है। छिटपुट काले बाल भी महज कुछ ही दिन के और मेहमान नज़र आ रहे। 

गहरी सांस लेते हुये वह बड़बड़ाई, ‘’आईना नहीं मेरी याददास्त ही धुँधली हो गई है। अब देखो वक्त कितनी जल्दी गुजरता है, जैसे कल ही इस घर में मैं लाल जोड़े में आई होऊं। माँ, बाबू जी सब धीरे धीरे चले गए। अरे माँ बाबू का तो वक्त आ गया था पर इन्होने ! इन्होने तो सात जन्म तक का साथ निभाने की कसमें खाई थी, यह जनम भी नहीं निभाए। मुझे छोड़ गए अकेले, विरहिन बना के। समझ नहीं आता क्यों सात जन्म के कसमें वादे खाते हैं, जब यह भी जन्म पूरा नहीं निभाया जाता। 


वह शीशे में अपने आपको देखते हुए खो सी गई, ’आठ साल बीत गए शान के पापा को गुजरे हुये, ये घर भी वहीं है यहां के कमरे भी वही हैं। ऐसा लगता है शान के पापा साँझ होते ही लौटते होंगे, और आवाज देंगे .. ‘’कमला अरी भाग्यवान ज़रा एक कफ चाय तो बनाना’’, ‘और मैं झल्लाते हुये बोलूँगीं घर में तबियत से पैर रखा नहीं और चाय चाय की रट शुरू’’ । उनके जाने के बाद अब मन ही नहीं लगता, जिस पर झल्लाती थी वो वजह ही खत्म हो गई। शान की शादी भी इनके जीवित रहते हो गई, अच्छा ही हुआ। जीते जी बहू देख लिए। पूजा बहू ने दो साल में हम सब को दादा दादी बना दिया। 

इन्होने नाम भी पोते का ऐसा रखा .. बेटे का शान और पोते का ‘शानू’ । ये रोज सुबह सुबह पार्क लेकर जाते थे, जब दोनों दादा पोते वापस लौटते तो वही अदा, ‘’ कमला, अरी भाग्यवान जरा एक कफ चाय तो बनाना । यह सुनकर इन पर बहुत झुनझुलाहट आती मगर शानू की तो तोतली आवाज सुनते ही सब अच्छा हो जाता, जैसे कानों में कोई मिसरी घोल जाता। 

शान और पूजा के ऑफिस से आते आते शानू सो चुका होता था। पूजा रोज ही पूछती, ‘’माँ शानू ने आप लोगों को तंग तो नहीं किया ज्यादा, और मैं झिड़कते हुए कहती थी, ‘’ अरे जाओ .. मेरा पोता किशन कन्हईंया है’’ और वह मुस्कुराते हुये चली जाती।


मगर जब से शान के पापा गये तब से तो दिन ही नहीे कटता। ये घड़ी की टिक टिक भी कान में चुभती है, और और वह पेड़ की छाया जो शाम होते ही घर की सीढी तक आ जाती थी, वह भी जल्दी नहीं आती।

ये जिंदगी है की अब तो कटने का नाम नहीं लेती, एक एक मिनट पहाड़ हुआ जा रहा । आखिर हमें भी क्यों नहीं बुला लेता भगवान … ! अब तो शानू भी कोई स्कूल जाने लगा है, बड़ा हो गया है। मेरी नहीं इच्छा अब कुछ और देखने की ।

अब ये घर तो भायं भायं करता है, जैसे पीछे पीछे उदासी की कोई छाया चलती है। सब कुछ होने के बाद भी एक अधूरापन सा रहता है । कमला कभी अतीत तो कभी वर्तमान में गोते लगा ही रही थी कि जोर से घंटी बजी और उसकी तन्द्रा टूटी। हड़बड़ा कुंडी खोला तो शानू और उसके मामी-पापा थे। वह उससे तेजी लिपट गया।

कमला ने कहा, “ चलो अंदर पहले जूते- कपडे वगैरह निकालो, आठ पैर धुलो, भूख लगी होगी । शानू ने उसके चेहरे की तरफ देखा और कहा, हे दादी आप रो रहीं, क्यों?’’ वह अपने सवालों की बौछार शुरू कर चुका था, हमेशा की तरह ।

कमला ने आँख पोंछते हुए कहा, कुछ नहीं- कुछ नहीं बस ऐसे ही । शानू ने जिद कर लिया, तो कमला ने लगभग हारते हुए कहा, कुछ नहीं बाबा, बस तुम्हारे दादा की याद आ गई थी… इतना कह कर वह पोते को अपने आँचल में छिपा ली…. और पोता हंसे जा रहा था .. ‘ दादी को दादा की याद आ रही’…

Wednesday, 6 April 2016

कोई अहसास नासूर सा...

हर वक्त हर पल अन्दर ही अन्दर तेरी यादें कचोटती रहती है। लगता है मैं तो क्लेयर थी, मगर छी.. छी.. छी…!आखिर क्यूँ आया वह जिंद़गी में, जिसने पल-पल घुटने के लिये छोड़ दिया, आखिर मेरी ग़लती क्या थी, जो उसने इतनी बड़ी सज़ा सुना दी । आज जिन्दा होकर भी जिन्दा नहीं, ऐसे घाव दिये जो दिखते नहीं, मगर हर पल दर्द देते रहते है।

खुद को बड़ा छला हुआ सा महसूस करती हूँ, मानों किसी ने प्यार ही प्यार में छल लिया हो। फिर सोचती हूं अगर वो ऐसा ही था तो प्रभु क्यूँ मिलवाया तूने ऐसे बेरहम इंसान से, जिसे मेरे होने से कोई फर्क़ नहीं पड़ता, मगर उसके ना होने से मुझे कितना फर्क़ पड़ता है ये तो मैं ही जानती हूँ। जैसे दीमक अन्दर ही अन्दर लकड़ी को खोखला कर देती है, ठीक वैसे ही उसकी गैऱमौजूदगी मुझे अन्दर ही अन्दर खोखला कर रही है।प्यार और प्यार का अहसास अब नासूर सा लगता है, जिसकी मिठास ज़हर से भी ज्यादा जहरीली लगती है।

कितना अजीब होता है ना, ये अहसास ! पहले तो हर किसी के लिये आता नहीं, और जब आता है तो उसके लिये बहता ही रहता है, कभी आँसू बनकर, कभी इन्तज़ार बनकर, तो कभी ख्वाब बनकर। कभी-कभी लगता है, काश ! जिंद़गी में ये अहसास उन लोगों के लिये मौजूद होना चाहिये जो बेइंतहा मोहब्बत करते है मुझसे, मगर होता इसके ठीक उल्टा है। ये अहसास होता जरूर है मगर उनके लिये जिनके लिये हम कुछ भी मायने नहीं रखते, ना तब और ना अब।

पहले सोचती थी कि ये शायर, कवि इनकी दर्द भरी शायरी, भावनात्मक कवितायें आखिर कैसे बनती होंगी, पर आज ये धुँध भी साफ हो गई। उनके भी दिल टूटे होंगे, उनका भी दम घुटता होगा, उनकी भी बेपनाह मोहब्बत ने दम तोड़ा होगा। कोई टूट जाता है, तो कोई टूटकर बिखर जाता ही है इसमे।

लगता है भूल जाओ उस शख्स को, पर काश... ! हो पाता ऐसा । दुनिया को दिखाने के लिये हँसना ही पड़ता है। खासकर उस शख्स के सामने, यह दिखाने के लिए कि,’’देखो तुम्हे क्या लगता है मैं जी नहीं पाऊँगी मगर देखो मैं कितनी खुश हूँ।’’

फिर खुद ही सोच में पड़ जाती हूँ, क्या वाकई में खुश हूँ या फिर अब खुद से ही छलावा करने लगी हूँ ? आखिर कब तक बिखरती रहूँगी, कब तक उसकी यादें ठहरी रहेगी मेरे जहन में, उसकी हर बातें मेरे दिलो दिमाग में चलती रहेंगी, क्या करूँ, किससे कहूं। ये कहकर पाखी फूट फूट कर रोने लगी, उसकी सारी समझदारी धरी की धरी रह गई, बावरी हो चुकी थी, और बहुत तरस खा रही थी खुद की हालत देखकर, मानो वो एक पंछी है जिसे पिंजरे में क़ैद कर लिया हो और बाहर निकलने के लिये फड़फड़ा रही हो।

पिंजरे को खोलने वाले वहां मौजूद बहुत लोग थे मगर अफसोस दिल नहीं दिमाग वाले। पाक़ पाखी सिर्फ़ खुद को तमाशा मान रही थी सिर्फ तमाशा।।।

Friday, 1 April 2016

कुछ अल्फाज़

कभी शब्द तो कभी लहज़ा बनती हूँ
कभी होठों की मुस्कान
कभी आँखों का इन्तज़ार बनती हूँ
कभी मौसम तो कभी पतझड़,
कभी सर्दी तो कभी गर्मी बनती हूँ
उम्मीदों सी भरी महफ़िलों में 
नाउम्मीद सी रहती हूँ..
ना शिकवा, ना शिकायत है किसी से
 बस खुद में ही खुद को ढूँढती रहती हूँ
ज़िंदगी है गहरी राज़ भी होते उससे गहरे
 यहाँ पर हर शख्स का होता अपना अंदाज़
उनको सुनकर अपनेआप से सवाल करती हूँ..
अपनी ही ज़िंदगी के हर एक पन्ने पर 
ग़मों की सियाही चलाती हूँ..
भावनायें भी है संवेदनायें भी है
जो कभी ठहरती, कभी बहती है
 इनको महसूस करके नज़र अंदाज करती हूँ..
मुकम्मल हो ज़ाहिद तेरी हर ख्व़ाहिश
खुदा से बस यही दुआ करती हूँ