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Tuesday, 31 May 2016

सुनो...

सुनो...
आज तुम ख्वाबों में आये थे
सुबह के ख्वाबों में
सुना है सुबह के ख्वाब हकीकत बयां करते है
ये ख्वाब जल्द ही सच होंगे
ख्वाबों के बाद अब 
तुम हकीकत में दस्तक दोगे
महसूस हुआ आज
मानों सदियों की खामोशी टूट गई हो
मानों इन्तज़ार की घड़ियाँ अब खत्म होने को है
ये धूप आज चिलचिला नहीं रही 
बल्कि मेरी खुशी में खिलखिला उठी है
क्यूँकि तुम जल्दी लौटकर आने वाले हो...

शायद हां, शायद ना...

वो अजीब है...
कभी करीब है
कभी नसीब है
मिलेगा कभी या सिमटकर रह जायेगा
शायद हां, शायद ना
ख्व़ाबों में आता है,
कहता है मगर कभी कभी,
शायद खामोशी पसंद है उसे
चेहरे पर मुस्कुराहट सजाकर रखता है,

रोज़ देखती हूँ उसे
वो देखता है या नहीं
शायद हां, शायद ना
वक्त ने मिलने से पहले ही दूर कर दिया,
समझाने से पहले ही समझा दिया,
जानता है, या जानना चाहता है
शायद हां, शायद ना

दफ्ऩ है ख्वाहिशें उसकी या मेरी
या फिर हम दोनों की
शायद हां, शायद ना
लफ्ज़ हवाओं जैसे है मेरे भी
कभी ठंडक, कभी गर्माहट देते है
क्या तुम हवा बन सकते हो
शायद हां, शायद ना....




मैं तेरे इश्क की रहगुज़र नहीं

मैं तेरे इश्क की रहगुज़र नहीं जो यूँ ही गुज़र जाऊँ,
तुम्हें पता है जन्नत क्या है? बतलाऊँ तुम्हें तो सुनों..
मेरे लिये तुम्हें देखना,
तुम्हें महसूस करना,
तुम्हें हर वक्त जानना,
तुमसे किसी ना किसी बहाने से बात करना ही,
मेरे लिये जन्नत है...
अब तुम सोचोगें कि इस ज़माने में भी ऐसे इश्क करने वाले लोग होते है?

तो सुनो..
ज़माना कैसा भी क्यूँ ना हो,
लोग कितने भी बदले हुये क्यूँ ना हो इश्क करने वालो के लिये
ज़माने, बदले हुये लोगों से मतलब नहीं
वो तो सिर्फ़ अपने इश्क में मशगूल रहते है,
वो तो सिर्फ़ अपनी मोहब्बत में डूबे रहते है,
समझ आया ना!!!मैं तेरे इश्क की रहगुज़र नहीं, 
जो यूँ ही गुज़र जाऊँ...

बोलूँ कुछ... !!

बोलूँ कुछ...!!!
सुनोंगे मगर समझोंगे नहीं
भावनायें क्या
ये लहरें है
जो कभी उठती है, 
कभी ठहरती है
कभी पिंज़रे में बंद
पंक्षी सी फड़फड़ाती है
तो कभी पिंज़रे में ही
 इठलाती भी है

प्यार क्या !
इसके लिये एक लफ्ज़ कहो या हज़ार 
फिर भी ना जाने कम ही लगता है

नफ़रत क्या..! 
इसकी खासियत कहो 
या ख़ामी
ये जहां में एक ही से हो सकती है
इसका हक़दार हर कोई नहीं

दोस्ती क्या.. !
विश्वास की डोर कमज़ोर हो सकती है 
मग़र टूट नहीं सकती,
दोस्त ज़्यादा हो सकते है
मगर दोस्ती कुछ से ही
जिनसें शिकायत भी शिक़वे भी

मगर फिर भी...

तुम पत्थर थे!!!
इसलिये मैं पत्थर बन गई
तुम्हें खुले आसमां में उड़ना पसंद नहीं
मैंने उड़ना भी बन्द कर दिया
तुम खामोश रहते, 

मैंने भी खामोशी का लिबास पहन लिया
तुम्हें हँसना पसंद नहीं था,
मैंने भी हँसना छोड़ दिया
तुम्हें बात करना पसंद नहीं था,

बस मैंने बात ना करने की कोशिश की
मगर नाकाम रही
खैरियत कह कहकर मैंने
झूठ भी बोलना सीख लिया,
तेरे जैसी तेरे लिये हो गई
मानों मैं कोई सफेद रंग हूँ
मगर फिर भी!!!
मैं ना तेरी हो पाई और ना तेरी जैसी ही 
बस रही आधी अधूरी ख़्वाहिश
जो कभी पूरी नहीं होती