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Monday, 14 August 2017

कभी मौन कभी मुर्दा

निकल आई हूँ मैं
तुम्हारी प्रेम की बस्ती से
जहां रहती थी मौजूद
समुद्र जैसी ख़ामोशी
लेकिन इसी ख़ामोशी में
दिखता था दोनों का समर्पण
ये समर्पण कोई समझौता नहीं था
बल्कि थी प्रेम की भावना
प्रेम की वो भावना
जो बिना बोले
कह जाती थी हज़ारों लफ्ज़
पता है
ये हज़ार लफ्ज़ों का कारवां मानों
सिर्फ़ कारवां निकला
जिसने बदला रूप "मुसाफिर" का
उन्स जो रहा ढाल बनकर दोनों के दरमियां
वो करता रहा विनती मुसाफिर से
पर मुसाफिर जो रहा थोड़ा शातिर
जिसने अपने हटीले मिज़ाज से
हिज्र की मदद से उन्स को खत्म कर दिया
इस ख़ात्मे से कहीं ना कहीं
दोनों की आत्मायें आहत हुई है
जो रोज़ उत्पन्न करता है अपना रोष
कभी मौन रहकर तो कभी मुर्दा बनकर
विभा परमार

Wednesday, 19 July 2017

इन्तज़ार

बस हूँ ज़िंदा मैं वहां
जहां तुम छोड़ कर  गए
ना कुछ कहकर
और ना सुनकर
बड़ी थरथराई सी रहती है
अब ये सुबह
और सहमी सहमी सी रहती है ये रातें भी
हां
सुबह तो कट जाती है मन को इधर उधर  बहलाकर, फुसलाकर या फिर तुम्हारी यादों की फसलों को याद करके
मगर ये रातें बड़ी खारी लगती है
या खारी हो गई है
जिसकों मैं जितना पीती हूँ
पर प्यास है कि बुझती नहीं
वो और बढ़ जाती है
बुझी बुझी और थकी थकी सी आँखों के आँसू नहीं बहते
बस बहता है सिर्फ़
"इन्तज़ार"
विभा परमार

Tuesday, 11 July 2017

बोलती भावनाएँ

आज वो मिली थी सड़कों पर मुझे
जो रिस रही थी धीरे धीरे
खुद से नाराज़ सी लगी
कभी चुप, कभी  ख़ामोश सी हो जाती
कुछ डरी डरी और कुछ सहमी सहमी सी
देखकर मुझे और दूर जाने लगी
और कहने लगी
मैं भी तुम इंसानों के अंदर पाई जाती थी
और तुमने मुझे भावना का नाम दिया था
जिसमें रहती थी संवेदनायें पर जैसे जैसे
 तुम्हारे अंदर नये ज़माने ने पनाह ली
और तुममे मौजूद रहने लगी मशीनी मंशाये
मैं तुमसे दूर होती गई
क्यूँ कि मशीनी मंशाये और भावना
आखिर साथ में कैसे रह सकती थी भला
तुम दूसरों को कष्ट पहुँचा कर
स्वार्थ सिद्ध करके खुद को खुशी दे सकते हो
मगर मैं ऐसा नहीं कर पाती
पड़ने लगी मुझ पर तुम्हारी दी झुर्रियाँ
मानो लगता हो बूढ़ी हो चुकी हूँ तुम लोगों के लिए
तुम लिप्त खुद में
और मैं निकल आई तुम्हारे अंदर से
इन सड़कों पर कि शायद
मिल जाए मुझे मेरे साथी
दया, प्रेम, अपनेपन के हमराज़
विभा परमार

ज़मी परतें

मैं पूर्ण थी तब तक
जब तक तुम मौजूद थे
तुम्हारा आना मानों
हवा का वो झोंका था
जिसमें मैं भी उड़ चली
उन झोंको में हम दोनों ने मिलकर
गुज़ारे जिंदगी के वो हंसीं पल
जिनके अहसास अब तक जिंद़ा है दिल के दरीचों में कहीं
फिर झोंको से दूर जाने की घड़ी भी आई
और दूर जाने से
दरीचों की परतें भी धीरे धीरे जम गई
दरीचें इतने सख्त कि
ना सवाल पूछे गए और
ना ही जवाब दिए गए
कुछ मौजूद है हम दोनों में कहीं
जिसको दे सकते है नाम अपनेपन का
मगर वो अपनापन भी लिपटा हुआ है खामोशी में यकीनन खामोशी से लिपटी अपनेपन की धारा से ज़मी परते ज़रूर पिघलेगीं।
विभा परमार


कालिख मोहब्बत की

सुनो
मेरे पास तुम्हारे लिए कोई उपहार तो नहीं है
लेकिन है मेरे पास शब्दों की वो बेल जिसको पिरोती हूँ मैं,
रोज़ दर रोज़
मालुम है ये मुझे
कि तुमको नहीं होगा यकीं
मेरी पिरोयी गई उस बेल पर
क्यूँ कि तुममे कहीं ना कहीं
नीम की कड़वाहट जन्म ले चुकी है जिसकी उम्र ज्यादा लम्बी नहीं है
क्यूँ कि दिल के किसी कोने में
मोहब्बत की कालिख भी मौजूद है
जिसमें मिलकर कड़वाहटों की ख़िश्त भी टूटेगी!
विभा परमार

भीगीं यादें

तुम्हारा और  मेरा मिलना
इत्तेफाक तो कभी नहीं रहा
ना तुम्हारे लिए
और ना ही मेरे लिए
सोंधी सोंधी मोहब्बत की मिश्री
धीरे धीरे  घुलने लगी
नज़रों से शुरू मोहब्बत
बातों तक पहुंची
ये बातें नज़दीकियों में कब तब्दील हो गई
इसके लिए तुम्हारा और मेरा बोलना ज़रूरी तो नहीं
तुम्हारा चूमना सिर्फ़ मेरे देह को चूमने तक सीमित नहीं था ,बल्कि मेरी आत्मा तक पहुंचना था
तुम्हारा स्पर्श, तुम्हारी बातें,
और तुम्हारी नज़रों में मेरे लिए
प्रेम सिर्फ़ चंद दिनों की नुमाईश नहीं बल्कि
जिंदगीभर भीगी यादें है।
विभा परमार

Thursday, 6 April 2017

उम्र भर का फलसफा

हां
तुम मेरी आदत में शुमार
तुम्हीं सुबह और तुम्हीं शाम हो
फिर
तुमसे हिचकिचाहट कैसी
और कुछ भी बोलने में शर्म कैसी
मैं बादल की संज्ञा देकर
तुम्हें खुद से दूर नहीं करना चाहती
और ना ही
खुद धरा बनकर दूर रहना चाहती
ना ही तुम मेरी किताब का कोई हसीं पन्ना हो जो पलट जाए
तुम मेरे जीवन का संपूर्ण अध्याय हो
और ये अध्याय तो ज़िंदगी भर
चलता रहता है
इसकी उम्र तो सिर्फ़ मौत पर ही
खत्म़ होती है

दर्द

ठगा सा महसूस करती हूँ
खुद में कहीं
अजीब सी चुभन रहती है
कहीं मेरे अंदर
मानों चल रहा हो कोई अंतर्द्वंद
बहुत चोटे आई है
जिनके घाव
दिखते नहीं पर दर्द ज़रूर देते है
जिंदगी की खूबसूरती कब सियह
बन गई पता ही नहीं चला
दिल के रिश्तों को सिया था कभी
उनको उधेड़ कर तुमने
अरबाबे-जफ़ा ज़ाहिद का फर्ज़ अदा किया है
(अरबाबे-ज़फा-कष्ट देने वाला)

Monday, 20 March 2017

उदासी

अब महसूस होता है
मुझे कि उदासी तुमसे
मेरा गहरा रिश्ता हो चला है
जो मेरे विचारों,
भावनाओं, बातों,
और मेरी मुस्कान में
खुशबू की तरह
हमेशा मौजूद रहती हो,
तुमने मेरे अंदर की रिक्तता को
मानों जड़ से ख़त्म कर दिया हो,
कितनी अच्छी होना ना तुम
जो ना बादलों की तरह गरजती है
और ना बारिश की तरह बरसती है
बस ख़ामोशी के प्रेम में लहराती
रहती हो!

Wednesday, 15 March 2017

सदाएं ..

वो सांझ
वो सुबह
कितनी मँहगी थी ना
जिसको कोई खरीद नहीं सकता था
ना तुम ना हम
पर आज कुछ अहसास हुआ
शायद दस्तक दी खरीददारों ने
कोशिश हुई
तुमको मुझसे दूर करने की
ख़ामोशी से मैं
सिर्फ़ तुमको ताकती रही
और देखते ही देखते
तुम आसानी से बिक गए
थी कुछ बात जो तुमसे कहनी थी
और शायद सुननी थी
मगर अब वो भी सहम सी गई
क्यूँ कि उसे मालूम है
तुम बिक चुके हो
उन खरीददारों के हाथों में
भावनाओं का समंदर जो गहरा था
वो खत्म हो रहा
अब ना तुमसे शिकायत
और ना कोई उम्मीद
सिर्फ़ है बस मलाल
जो रह रह कर
दिल को कचोटता है
अहसास और अहमियत जैसी बातें
फटे पन्नों पर सुहाती है
कुछ मेरी जिंदगी
इन्हीं फटे पन्नों सी
नज़र आती है

Tuesday, 7 March 2017

एक जहां ऐसा हो

वह जगह मौजूद है क्या कहीं
जहां ठहराव हो कुछ क्षण के लिए
मुश्किलों पर विराम हो
महसूस होता है अब!
कि धक्का खाती फिरती हूँ खामोशी के साये में कहीं
रोज़ धोखे के अक्षरों की पैठ मजबूत होती है
पल पल यहां
ना जाने क्यूँ कभी कभी ये
मासूमियत और भोलेपन को देखकर ऊब सी लगती है
इन सबके प्रति बड़ी नीरसता सी महसूस होती
है कोई बोझ
जो आत्मा को निरंतर नकारात्मकता की खाई में धकेलने की कोशिश करता है
लगता है अब
ये दोगली बातें
बनावटी बंदिशें
तर्क कुतर्क की महामारी
नष्ट हो जाए
बस अपनी कल्पनाओं का इक जहां वास्तविकता में ऐसा हो
जिसमें हो सिर्फ़ निःस्वार्थ प्रेम

अंतरद्वंद

कोई अंर्तद्वंद
चलता है निरंतर
अंतर्मन में
शायद है कोई ऐसी टीस
जिसकी कुलबुलाहट
ज़मी के दरीचों में अक्सर सिसकती है
कितनी ही बार दरीचों को
कुदेरा है मैंने
कभी
खामोशी की सिलवटों को ओढ़कर
कभी खुद को दोषी बनाकर

हमारा-तुम्हारा क्या रब्त

मैं सिर्फ़
इक अंधेरा हूँ
रात का अँधेरा
जो मौजूद रहता है अक्सर
तुम्हारी तन्हाई में
मायूसी में
और अकेलेपन में
अँधेरे (मेरी) की आहें
सिसकती है हर रोज़
पर ये आहें तुम्हें सुनाई नहीं देती
क्योंकि तुम ठहरे दिन के उजियारे
और उजियारे अँधेरे का
आखिर क्या रब्त़

Wednesday, 22 February 2017

उदासी

उदासी 
दुनिया की सबसे खूबसूरत रचना
जो कभी साथ नहीं छोड़ती 
जिसको खोने का कोई डर नहीं

डर होता है महज 
सिर्फ़ क्षणभंगुर खुशियों से 
जो कभी दो पल भी नहीं ठहरती

सदियों से साथ है 
हमारा और उदासियों का 
जब से तुमने 
दो कदम साथ चलने के 
वादे से कदम पीछे खींचा

Friday, 3 February 2017

रीतापन

अजीब सा खालीपन
मौजूद रहता है
मेरे अंदर
जिसे उम्मीदों के मरहम से
हर रोज़ भरने की
कोशिश करती हूँ
मगर कोशिश में नाकामी मिलती है
ये जो
खालीपन का पतझढ़ है ना
इसकी उम्र बहुत लम्बी होती है
और इस उम्र में ना जाने
कितने सुलझे हुए वसंत दस्तक देने आते है
जो ठहरते भी है लेकिन
सिर्फ़ कुछ वक्त के लिए
शायद
ठहरने की उम्र खालीपन से बहुत कम रहती होगी

Saturday, 28 January 2017

उलझनें

इक आह रहती है
रोज़ दर रोज़
अब टीस बन गई है जो अब
इसकी हरारत से अक्सर
खुद को खुद में ही गुम पाती हूँ

शायद है कोई है ग़म का भँवर
जिसमें जा रही हूं उलझती हुई
कोशिश करती हूँ
उलझनों को सुलझाने की
पर कुछ नई गांठें पड़ जाती हैं
एक तरफ लगाती हूं नए पैबंद
दूसरी तरफ से उखड़ जाती है

Thursday, 5 January 2017

चलो एक काम करें ..

बारिशों की तरह
बरसती है आँखें
आओ इनको
कोई नाम दिया जाए
सांसों की शाम
कब ठहर जाए
आओ इनको किसी के नाम किया जाए
किनारें ठहरे हम नदियों के
चलो मिलकर कोई अंजाम दिया जाए
अश्क भी साथी
लफ्ज़ भी साथी
क्यूँ ना इश्क की परछाई को
कैद किया जाए

Tuesday, 3 January 2017

सूखे पत्ते और बारिश की बूँदें

1 . 
मैं शंकित नहीं होना चाहती
और ना ही बनना चाहती हूँ 
 उपहास का पात्र 
 तुम्हें बनाना भी नहीं चाहती
नहीं मालुम तुम्हारे लिए क्या  मतलब  है इश्क का
मगर  मेरे लिए
ये आत्मा
समर्पण
विचारों और
भावनाओं का गहरा संगम है
जो पानी की तरह बहता है
जिसमें बातों का टकराव होता है
विश्वास का नहीं

2.  

बिखरी सूखी पत्तियों सी ठहरी मैं 
कहीं तुम वो हरियाले वसंत तो नहीं
कड़कती बिजली सी बिफरी मैं 
कहीं तुम वो बरसते बादल तो नहीं
है अजनबी भी, है अंजान भी हम 
कहीं तुम्हारी प्यार भरी बातें कोई भ्रम जाल तो नहीं
नाउम्मीदी का खाली कमरा है मेरे अंदर
जिसमें सिर्फ़ अश्कों के मोती चमकते है
कहीं तुम वो उम्मीद की रोशनी तो नहीं
कुछ अधूरे लफ्ज़ है कुछ अधूरी बातें
कहीं तुम मेरे लिए वो पूरी बात तो नहीं
गुम हूं अपनी उलझन भरी जिंदगी में 
कहीं तुम वो सुलझन बनकर मौजूद तो नहीं,