Search This Blog

Wednesday, 19 July 2017

इन्तज़ार

बस हूँ ज़िंदा मैं वहां
जहां तुम छोड़ कर  गए
ना कुछ कहकर
और ना सुनकर
बड़ी थरथराई सी रहती है
अब ये सुबह
और सहमी सहमी सी रहती है ये रातें भी
हां
सुबह तो कट जाती है मन को इधर उधर  बहलाकर, फुसलाकर या फिर तुम्हारी यादों की फसलों को याद करके
मगर ये रातें बड़ी खारी लगती है
या खारी हो गई है
जिसकों मैं जितना पीती हूँ
पर प्यास है कि बुझती नहीं
वो और बढ़ जाती है
बुझी बुझी और थकी थकी सी आँखों के आँसू नहीं बहते
बस बहता है सिर्फ़
"इन्तज़ार"
विभा परमार

Tuesday, 11 July 2017

बोलती भावनाएँ

आज वो मिली थी सड़कों पर मुझे
जो रिस रही थी धीरे धीरे
खुद से नाराज़ सी लगी
कभी चुप, कभी  ख़ामोश सी हो जाती
कुछ डरी डरी और कुछ सहमी सहमी सी
देखकर मुझे और दूर जाने लगी
और कहने लगी
मैं भी तुम इंसानों के अंदर पाई जाती थी
और तुमने मुझे भावना का नाम दिया था
जिसमें रहती थी संवेदनायें पर जैसे जैसे
 तुम्हारे अंदर नये ज़माने ने पनाह ली
और तुममे मौजूद रहने लगी मशीनी मंशाये
मैं तुमसे दूर होती गई
क्यूँ कि मशीनी मंशाये और भावना
आखिर साथ में कैसे रह सकती थी भला
तुम दूसरों को कष्ट पहुँचा कर
स्वार्थ सिद्ध करके खुद को खुशी दे सकते हो
मगर मैं ऐसा नहीं कर पाती
पड़ने लगी मुझ पर तुम्हारी दी झुर्रियाँ
मानो लगता हो बूढ़ी हो चुकी हूँ तुम लोगों के लिए
तुम लिप्त खुद में
और मैं निकल आई तुम्हारे अंदर से
इन सड़कों पर कि शायद
मिल जाए मुझे मेरे साथी
दया, प्रेम, अपनेपन के हमराज़
विभा परमार

ज़मी परतें

मैं पूर्ण थी तब तक
जब तक तुम मौजूद थे
तुम्हारा आना मानों
हवा का वो झोंका था
जिसमें मैं भी उड़ चली
उन झोंको में हम दोनों ने मिलकर
गुज़ारे जिंदगी के वो हंसीं पल
जिनके अहसास अब तक जिंद़ा है दिल के दरीचों में कहीं
फिर झोंको से दूर जाने की घड़ी भी आई
और दूर जाने से
दरीचों की परतें भी धीरे धीरे जम गई
दरीचें इतने सख्त कि
ना सवाल पूछे गए और
ना ही जवाब दिए गए
कुछ मौजूद है हम दोनों में कहीं
जिसको दे सकते है नाम अपनेपन का
मगर वो अपनापन भी लिपटा हुआ है खामोशी में यकीनन खामोशी से लिपटी अपनेपन की धारा से ज़मी परते ज़रूर पिघलेगीं।
विभा परमार


कालिख मोहब्बत की

सुनो
मेरे पास तुम्हारे लिए कोई उपहार तो नहीं है
लेकिन है मेरे पास शब्दों की वो बेल जिसको पिरोती हूँ मैं,
रोज़ दर रोज़
मालुम है ये मुझे
कि तुमको नहीं होगा यकीं
मेरी पिरोयी गई उस बेल पर
क्यूँ कि तुममे कहीं ना कहीं
नीम की कड़वाहट जन्म ले चुकी है जिसकी उम्र ज्यादा लम्बी नहीं है
क्यूँ कि दिल के किसी कोने में
मोहब्बत की कालिख भी मौजूद है
जिसमें मिलकर कड़वाहटों की ख़िश्त भी टूटेगी!
विभा परमार

भीगीं यादें

तुम्हारा और  मेरा मिलना
इत्तेफाक तो कभी नहीं रहा
ना तुम्हारे लिए
और ना ही मेरे लिए
सोंधी सोंधी मोहब्बत की मिश्री
धीरे धीरे  घुलने लगी
नज़रों से शुरू मोहब्बत
बातों तक पहुंची
ये बातें नज़दीकियों में कब तब्दील हो गई
इसके लिए तुम्हारा और मेरा बोलना ज़रूरी तो नहीं
तुम्हारा चूमना सिर्फ़ मेरे देह को चूमने तक सीमित नहीं था ,बल्कि मेरी आत्मा तक पहुंचना था
तुम्हारा स्पर्श, तुम्हारी बातें,
और तुम्हारी नज़रों में मेरे लिए
प्रेम सिर्फ़ चंद दिनों की नुमाईश नहीं बल्कि
जिंदगीभर भीगी यादें है।
विभा परमार