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Tuesday, 11 July 2017

ज़मी परतें

मैं पूर्ण थी तब तक
जब तक तुम मौजूद थे
तुम्हारा आना मानों
हवा का वो झोंका था
जिसमें मैं भी उड़ चली
उन झोंको में हम दोनों ने मिलकर
गुज़ारे जिंदगी के वो हंसीं पल
जिनके अहसास अब तक जिंद़ा है दिल के दरीचों में कहीं
फिर झोंको से दूर जाने की घड़ी भी आई
और दूर जाने से
दरीचों की परतें भी धीरे धीरे जम गई
दरीचें इतने सख्त कि
ना सवाल पूछे गए और
ना ही जवाब दिए गए
कुछ मौजूद है हम दोनों में कहीं
जिसको दे सकते है नाम अपनेपन का
मगर वो अपनापन भी लिपटा हुआ है खामोशी में यकीनन खामोशी से लिपटी अपनेपन की धारा से ज़मी परते ज़रूर पिघलेगीं।
विभा परमार


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